Wednesday, September 15, 2010

Pahli Preet...

ख्वाइशो के समंदर से, कोई मोती निकल आया,
कसक दिल में उठी, जब भी तेरा ख्याल आया...
कैसे भूल जाये, वो प्यार जो तुमसे पाया,
आज भी है यकीन, तुने मुझे सिर्फ मुझे ही चाहा...
अनछुए अहसास, जैसे बारिशो की बूँद थी,
ठंढी सर्द हवाएं थी, या मौसम की कोई रीत थी...
तपते रेगिस्तान से, दिल के ज़ख्म उभरे थे,
सुकून देती चांदनी सी, तेरी ही तो प्रीत थी...
न भूले हैं वो कुछ, न भूले हैं हम कुछ,
सदियाँ बीती तो क्या, पहली पहली प्रीत थी...

2 comments:

  1. madam ji aap itna accha likhti hai woh to aaj malum hu very nice man gaye ustad

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  2. keep it up i will try to follow you dear have a nice time

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