सत्य है... बिना गुरु के किसी भी प्रकार का ज्ञान होना संभव नहीं है... गुरु हमें हमसे मिलवाने में सूत्रधार का काम करते हैं...
हम स्वयं को कभी जान ही नहीं पाते... जानते हैं तो केवल अपने अहम् को... और उसी को मान लेते हैं...
जिन्होंने मुझे अपने आप से मिलवाने का प्रयत्न किया, मेरी सहायता की... उन्हें कभी मैंने धन्यवाद नहीं दिया... आज मैं उनका
आभार प्रकट करना चाहती हूँ....आप वो विशाल वृक्ष हैं, जिसकी छत्रछाया में अनेको अनेक छोटे और कमजोर पौधे पनप रहे हैं, जाने कितनी ही लताएं ऐसी हैं जो आपके सहारे की आस करती हैं. मैं भी उनमे से ही एक हूँ, जो आपके सानिध्य में बढ़ना चाहती हूँ. ऊंचाई की इच्छा नहीं, आपके साथ से बढ़ कर और कोई मुकाम हो ही नहीं सकता...
आपके साथ से मुझे अपने भीतर की तमाम बुराईयाँ... इर्ष्या, द्वेष, अहंकार, मोह का ज्ञात हुआ... जिन्होंने मुझे ये समझाया के ''अहंकार सदा बुरा होता है, चाहे वो स्व में हो... याने स्वाभिमान", "विशुद्ध प्रेम में इर्ष्या नहीं होती, मैं- मेरा का भाव नहीं होता.." जिसपर विजय पाने में आपकी सहायता और कृपा आवश्यक है... आप भी कहेंगे की मैं तो हठ कर रही हूँ... शायद हाँ... क्योंकि अपनी इस खोज में ये मेरी पहली उपलब्धि है जो मैंने अपने भीतर के विकार को जान गयी हूँ....
आपने मुझे अपने भीतर का रास्ता सुझाया है... साक्षी बनने के इस प्रयास में आप साक्षी रहे... इतनी ही प्रार्थना है...
मेरे भीतर के इस लौ को प्रज्ज्वलित करने के लिए शत शत नमन...
wo antar tam mein prakash lekar tab aat hai jab wahan koi naa ho naa deen naa duniya na aap khud
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