रतजगा करती हैं दोनों के इंतजार में पलकें,
न तुम ही आते हो, न नींद ही आती है...
कुछ आहट हुई तो पर्दा हटाया,
चाँद था, पूछ रहा था - तू आज भी जगती है...
सूनी पर आस भरी नज़रें जो उठाई मैंने,
छुप कर बदलियों क पीछे से बोला...
ऐसे मत देख, जाता हूँ,
पर तेरे इंतजार में किसी को तड़पता नहीं देखा मैंने...
बहुत देर हुई, चाँद आया नहीं वापस,
कहाँ गया होगा...
तुम सो चुके हो शायद, अगर जागते हो तो देखो,
तुम्हारी खिड़की के बाहर ही खड़ा होगा....
वो एकमात्र गवाह है मेरे प्यार का, मेरे इंतजार का,
ठिठुरती सर्दियों का, झुलसती गर्मियों का...
रिमझिम बदलियों का और हर मौसम में,
एक सी बरसती मेरी पलकों का...
मौसम सारे एक से बीते विरहा में रीते-रीते,
थक गए हम यूँ सफ़र अब तनहा जीते-जीते...
नींद न आई, चाँद न आया, रात भी अब ढलती है,
आ जाओ बस एक बार, कि सांस अभी चलती है...
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