Friday, November 19, 2010

अद्भुत


अद्भुत, शायद ये ही शब्द मेरी कलम से निकले, मेरे इस अहसास के लिए सही हैं.
कितना परिवर्तनशील है ये जीवन... मैंने कभी नहीं सोचा था... समय के साथ सब कुछ बदल जाता है....
ये सब मैं जो भी कह रही हूँ अपने जीवन की अप्रतिम क्षणों को महसूस कर के कह रही हूँ... इस वक़्त अपने छोटे से बेटे को सोये देख कर प्रेम के जिस रूप की अमरता, निश्छलता, निस्वार्थता या फिर यू कह लीजिये की इन सभी भावो का सम्मिश्रण का आभास  हो रहा है वो बयाँ करना शब्दों की परिधि से बाहर है.... हर एक कड़ी एक दूसरे से जुडी है शायद... इसलिए अद्भुत...
अपने मातृत्व पे गौरंवित हूँ... अपूर्णता से पूर्णता का सफ़र है ये....
चाहते तो आकाश सी सीमाहीन हैं, अनंत हैं, पर क्या सारी चाहतें पूरी होती हैं..?
वक़्त शायद... हाँ वक़्त ही तो... जाने वो सारी चाहतों को पूरी करता है या फिर कोई अन्य विकल्प हमारे सामने ले कर उपस्थित हो जाता है...
"अथर्व"... मेरा बेटा... उसके आने से मेरी ज़िन्दगी को जो अर्थ मिला है... उसके लिए मैं सदा ही इश्वर की प्रार्थी रहूंगी...
उसकी मुस्कुराहटें, शैतानियाँ, नटखटपन, रोना, मचलना, खिल्खिलाह्तें... सिर्फ मेरे घर को ही नहीं मेरी ज़िन्दगी को भी गुलज़ार करती हैं...
ये अद्भुत नही तो क्या है... की हम लोगो की कही गई बातों को या तो समझ नही पाते या कई बार गलत समझ लेते हैं... पर उसकी हर अनकही बात मैं कैसे समझ जाती हूँ... अब तो वो बहुत बातूनी हो गया है, पर जब वो बोल नहीं पाता था तब भी उसके बारे में मैं सबकुछ कैसे जान जाती थी... उसे कब नींद आ रही है, कब भूख लगी है...कब उसे बाहर जाना है... सबकुछ जो वो कह क अभिव्यक्त नहीं कर सकता था...
इस वक़्त श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के कविता "मेरा नया बचपन" की कुछ पंक्तिया बरबस  ही मेरे ज़हन को खटखटा रहे हैं...
"पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया,
उसकी मंजुल मूर्ति देख कर मुझमे नवजीवन आया,
मैं भी उसके साथ खेलती-खाती हूँ तुतलाती हूँ,
मिल कर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ,
भाग गया था मुझे छोड़ कर वो बचपन फिर से आया.."

Monday, November 15, 2010

आभार

''बिन गुरु ज्ञान कहाँ ते पाऊँ''
सत्य है... बिना गुरु के किसी भी प्रकार का ज्ञान होना संभव नहीं है... गुरु हमें हमसे मिलवाने में सूत्रधार का काम करते हैं...
हम स्वयं को कभी जान ही नहीं पाते... जानते हैं तो केवल अपने अहम् को... और उसी को मान लेते हैं...
जिन्होंने मुझे अपने आप से मिलवाने का प्रयत्न किया, मेरी सहायता की... उन्हें कभी मैंने धन्यवाद नहीं दिया... आज मैं उनका
आभार प्रकट करना चाहती हूँ....
आप वो विशाल वृक्ष हैं, जिसकी छत्रछाया में अनेको अनेक छोटे और कमजोर पौधे पनप रहे हैं, जाने कितनी ही लताएं ऐसी हैं जो आपके सहारे की आस करती हैं. मैं भी उनमे से ही एक हूँ, जो आपके सानिध्य में बढ़ना चाहती हूँ. ऊंचाई की इच्छा नहीं, आपके साथ से बढ़ कर और कोई मुकाम हो ही नहीं सकता...
आपके साथ से मुझे अपने भीतर की तमाम बुराईयाँ... इर्ष्या, द्वेष, अहंकार, मोह का ज्ञात हुआ... जिन्होंने मुझे ये समझाया के ''अहंकार सदा बुरा होता है, चाहे वो स्व में हो... याने स्वाभिमान", "विशुद्ध प्रेम में इर्ष्या नहीं होती, मैं- मेरा का भाव नहीं होता.."  जिसपर विजय पाने में आपकी  सहायता और कृपा आवश्यक है... आप भी कहेंगे की मैं तो हठ कर रही हूँ... शायद हाँ... क्योंकि अपनी इस खोज में ये मेरी पहली उपलब्धि है जो मैंने अपने भीतर के विकार को जान गयी हूँ....
आपने मुझे अपने भीतर का रास्ता सुझाया है... साक्षी बनने के इस प्रयास में आप साक्षी रहे... इतनी ही प्रार्थना है...
मेरे भीतर के इस लौ को प्रज्ज्वलित करने के लिए शत शत नमन...

Wednesday, September 15, 2010

Pahli Preet...

ख्वाइशो के समंदर से, कोई मोती निकल आया,
कसक दिल में उठी, जब भी तेरा ख्याल आया...
कैसे भूल जाये, वो प्यार जो तुमसे पाया,
आज भी है यकीन, तुने मुझे सिर्फ मुझे ही चाहा...
अनछुए अहसास, जैसे बारिशो की बूँद थी,
ठंढी सर्द हवाएं थी, या मौसम की कोई रीत थी...
तपते रेगिस्तान से, दिल के ज़ख्म उभरे थे,
सुकून देती चांदनी सी, तेरी ही तो प्रीत थी...
न भूले हैं वो कुछ, न भूले हैं हम कुछ,
सदियाँ बीती तो क्या, पहली पहली प्रीत थी...

Sunday, September 12, 2010

Intzaar....

रतजगा करती हैं दोनों के इंतजार में पलकें,
न तुम ही आते हो, न नींद ही आती है...
कुछ आहट हुई तो पर्दा हटाया,
चाँद था, पूछ रहा था - तू आज भी जगती है...

सूनी पर आस भरी नज़रें जो उठाई मैंने,
छुप कर बदलियों क पीछे से बोला...
ऐसे मत देख, जाता हूँ,
पर तेरे इंतजार में किसी को तड़पता नहीं देखा मैंने...

बहुत देर हुई, चाँद आया नहीं वापस,
कहाँ गया होगा...
तुम सो चुके हो शायद, अगर जागते हो तो देखो,
तुम्हारी खिड़की के बाहर ही खड़ा होगा....

वो एकमात्र गवाह है मेरे प्यार का, मेरे इंतजार का,
ठिठुरती सर्दियों का, झुलसती गर्मियों का...
रिमझिम बदलियों का और हर मौसम में,
एक सी बरसती मेरी पलकों का...

मौसम सारे एक से बीते विरहा में रीते-रीते,
थक गए हम यूँ  सफ़र अब तनहा जीते-जीते...

नींद न आई, चाँद न आया, रात भी अब ढलती है,
आ जाओ बस एक बार, कि सांस अभी चलती है...

Wednesday, August 18, 2010

Prem ki Prakashtha...

संस्कृत और हिंदी साहित्य में प्रेमी को भ्रमर की उपमा दी गयी है- जो एक पुष्प पर बैठता है, उसका रस पीता है और फिर दुसरे पर जा बैठता है. वो किसी एक का हो कर नहीं रह सकता.
उर्दू में प्रेमी को परवाना कहा गया है... जो दीपशिखा के आकर्षण में उसी पर जल कर अपने प्राणों की आहुति दे देता है.
भारतीय सभ्यता में "मर्यादा" नारी के लिए इस्तमाल किया गया शब्द है, नारी से अपेक्षित है के एक के अतिरिक्त दुसरे पुरुष का विचार भी अपने मन में न आने दे... याने " पुरुष भ्रमर और नारी परवाना..."
पर प्रेम तो प्रेम है... उसका तो किसी मजहब, उम्र, या परिस्थिति के कोई वास्ता ही नहीं है...  सच-झूठ, सही-गलत सब से परे एक अलग ही दुनिया होती है...
सब के लिए प्रेम के मायने भी अलग होते हैं और अहसास भी...
  प्रेम में पाना शब्द नहीं है, सिर्फ देना है, सिर्फ खोना है. खोने की एक अनुपम अनुभूति होती है...
राधा और मीरा दोनों ही  कृष्ण से प्रेम करती है. राधा उन्हें पाना चाहती है और मीरा... निस्वार्थ प्रेम की प्रतीक है. वो कुछ भी पाना नहीं चाहती, उनका प्रेम चाहत से बहुत ऊपर था, वो सिर्फ कृष्ण को चाहती है... बस... और कुछ नहीं... और कृष्ण में लींन हो जाती है, कृष्ण उन्हें अपने अंदर समाहित कर लेते हैं...

जो प्रेम में पाने की लालसा रखता है, वो उसे पा लेता है, और जो खोने की... उसे अपने आप को भी खोना पड़ता है. उसे अपनी पहचान, अपना अस्तित्व, सब कुछ खोना पड़ता है, वो अपना सर्वस्व खो देता है, फिर भी आन्दित है, प्रसन्न है, संतुष्ट है..

जहाँ प्रेम है, वहां विरह है... दर्द है... विरह शब्दों में नहीं आता, आंसूयों में आता है. विरह मौन है, शांत है, चुप है, कुछ बोलता नहीं, विरह सुनाई भी नहीं देता, बस... अनुभव की अनुभूति है. कुछ खालीपन का अहसास, कुछ छूटने की अनुभूति...
 तुम प्रेम को जानो, विरह अपने आप प्रकट होगा, की प्रेम की पहली प्रतीति विरह है... और अंतिम प्रतीति मिलन...

प्रेम को सिर्फ वही पा सकता है, जो मृत्यु के लिए तैयार हो, प्रेम जीवन ही नहीं अपितु मृत्यु भी है. उस शाश्वत प्रेम के अमृत को वही पा सकता है जिसमे जीवन की आहुति देने की शक्ति हो...

Tuesday, August 10, 2010

phir miloge kabhi...

ऊँचे ऊँचे पर्वत,चारो  और बादल ही  बादल... दूर दूर तक कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था... अलावा उन बादलो के... सावन की रिमझिम में तन तो क्या मन भी भीग रहा था.. और ऐसे में तुम्हारा हाथ थामे चलना किसी सपने से कम था क्या ? जानते हो! जब भी किसी हिल स्टेशन  पर जाती थी, या फिल्मो में, गानों में ऐसा कुछ देखती थी... तो बस तुम ही नज़र आते थे.
सालो इंतजार किया है मैंने... नहीं नहीं... इंतजार जैसा तो कुछ भी नहीं था मेरे पास, क्योकि  मैं जानती भी नहीं थी.. की कभी हम यूं  मिल जाएँगे, बस एक उम्मीद सी थी... और क्या... शायद... पता नहीं...
मन बहुत चंचल  है, बरबस भटकता ही रहा है, तुम इतने पास थे, तुम्हे महसूस कर पा  रही थी, तुम्हे छू पा रही थी फिर भी मन उदास था. जाने क्यों..? एक टीस जो कसक बनी कलेजे को तार तार किये जा रही थी... तुमसे अलग होने का दर्द था शायद...
पल भर को बादल छटा तो सबकुछ नज़र आया... पर्वत भी, पेड़ पौधे भी, झरने भी और चिड़िया भी...
पर फिर से बादल ने  सब छुपा लिया. ये लुका छिपी अच्छी लग रही  थी, पर दो मिनट के लिए तुम दूर गए और बादलो में दूर दूर तक नज़र नहीं आये...
मन बौराया सा और आँखे बेचैन सी जैसे अपने तपिश से उन बादलो में सुराख़ कर, तुम्हे देखने में कामयाब हो जाएगी... तभी तुम्हारी आवाज़ आई, बेचैन, घबराई सी... उनमे वही दर्द था, मेरे खो जाने की... आवाज़ की दिशा में मैंने कदम बढाया ही था की तुमसे जा टकराई, और तुमने मुझे खुद में समेट लिया... बस यही जन्नत थी... बस सारी सृष्टि रुक जाए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए... तुम्हारे प्यार के  अलावा.... बरसो बरस... बस तुम्हे ही चाह है...

कितना वक़्त बीत चुका है, ज़िन्दगी ने कितने उतार  चढ़ाव देखे, हर ख़ुशी में तुम्हे याद किया, हर दर्द में तुम्हारा कन्धा तलाशती रही, आँखों में सावन भादों की झड़ी भी इन्ही बादलो की तरह लुका छिपी का खेल खेलती रही...

आज जब तुम फिर से मिले हो तो क्या तुम्हे वो सब समझा पाउंगी... वो प्यार का अनछुआ  अहसास, वो टूट कर बिखरने का दर्द, वो तुम्हे खो देने की कसक, सालो की कसमसाती नींद, छोटी बड़ी हर बात जो हमसे  जुडी हो...

तुम बहुत आगे निकल आये हो, बहुत प्रक्टिकल हो गए हो, दुनियादारी की समझ भी आ गयी है... वो बचपन, वो अहसास अगर याद भी होगा तो अपनी ज़िन्दगी की उपापोह में वक़्त ही कहाँ इन सब फ़िज़ूल बातो पे ठहरने  का... और मैं चाहती भी नहीं की तुम कहीं भी ठहरो...

पर जब तुम मिले... तो मैंने पाया की मैं तो वही ठहरी हूँ ... अभी तक आगे बढ़ भी नहीं पायी हूँ , अभी भी उन्ही पिछली गलियारों में भटक रही हूँ, तुम्हे ढूंढ रही हूँ...

नहीं जानती की उस बुद्धू पागल 'अपने' से दोबारा मिल भी पाउंगी या नहीं, पर अब इंतजार ज़रूर करूंगी.. कभी तो तुम लौट के आओगे, कभी तो ये बादल छटेंगे और फिर सबकुछ साफ़ दिखेगा... हाँ... वो उडती चिड़िया भी.. जो बार बार हमारे आस पास अठखेलियाँ  करती   मुझे चिढ़ा रही थी....