Tuesday, August 10, 2010

phir miloge kabhi...

ऊँचे ऊँचे पर्वत,चारो  और बादल ही  बादल... दूर दूर तक कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था... अलावा उन बादलो के... सावन की रिमझिम में तन तो क्या मन भी भीग रहा था.. और ऐसे में तुम्हारा हाथ थामे चलना किसी सपने से कम था क्या ? जानते हो! जब भी किसी हिल स्टेशन  पर जाती थी, या फिल्मो में, गानों में ऐसा कुछ देखती थी... तो बस तुम ही नज़र आते थे.
सालो इंतजार किया है मैंने... नहीं नहीं... इंतजार जैसा तो कुछ भी नहीं था मेरे पास, क्योकि  मैं जानती भी नहीं थी.. की कभी हम यूं  मिल जाएँगे, बस एक उम्मीद सी थी... और क्या... शायद... पता नहीं...
मन बहुत चंचल  है, बरबस भटकता ही रहा है, तुम इतने पास थे, तुम्हे महसूस कर पा  रही थी, तुम्हे छू पा रही थी फिर भी मन उदास था. जाने क्यों..? एक टीस जो कसक बनी कलेजे को तार तार किये जा रही थी... तुमसे अलग होने का दर्द था शायद...
पल भर को बादल छटा तो सबकुछ नज़र आया... पर्वत भी, पेड़ पौधे भी, झरने भी और चिड़िया भी...
पर फिर से बादल ने  सब छुपा लिया. ये लुका छिपी अच्छी लग रही  थी, पर दो मिनट के लिए तुम दूर गए और बादलो में दूर दूर तक नज़र नहीं आये...
मन बौराया सा और आँखे बेचैन सी जैसे अपने तपिश से उन बादलो में सुराख़ कर, तुम्हे देखने में कामयाब हो जाएगी... तभी तुम्हारी आवाज़ आई, बेचैन, घबराई सी... उनमे वही दर्द था, मेरे खो जाने की... आवाज़ की दिशा में मैंने कदम बढाया ही था की तुमसे जा टकराई, और तुमने मुझे खुद में समेट लिया... बस यही जन्नत थी... बस सारी सृष्टि रुक जाए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए... तुम्हारे प्यार के  अलावा.... बरसो बरस... बस तुम्हे ही चाह है...

कितना वक़्त बीत चुका है, ज़िन्दगी ने कितने उतार  चढ़ाव देखे, हर ख़ुशी में तुम्हे याद किया, हर दर्द में तुम्हारा कन्धा तलाशती रही, आँखों में सावन भादों की झड़ी भी इन्ही बादलो की तरह लुका छिपी का खेल खेलती रही...

आज जब तुम फिर से मिले हो तो क्या तुम्हे वो सब समझा पाउंगी... वो प्यार का अनछुआ  अहसास, वो टूट कर बिखरने का दर्द, वो तुम्हे खो देने की कसक, सालो की कसमसाती नींद, छोटी बड़ी हर बात जो हमसे  जुडी हो...

तुम बहुत आगे निकल आये हो, बहुत प्रक्टिकल हो गए हो, दुनियादारी की समझ भी आ गयी है... वो बचपन, वो अहसास अगर याद भी होगा तो अपनी ज़िन्दगी की उपापोह में वक़्त ही कहाँ इन सब फ़िज़ूल बातो पे ठहरने  का... और मैं चाहती भी नहीं की तुम कहीं भी ठहरो...

पर जब तुम मिले... तो मैंने पाया की मैं तो वही ठहरी हूँ ... अभी तक आगे बढ़ भी नहीं पायी हूँ , अभी भी उन्ही पिछली गलियारों में भटक रही हूँ, तुम्हे ढूंढ रही हूँ...

नहीं जानती की उस बुद्धू पागल 'अपने' से दोबारा मिल भी पाउंगी या नहीं, पर अब इंतजार ज़रूर करूंगी.. कभी तो तुम लौट के आओगे, कभी तो ये बादल छटेंगे और फिर सबकुछ साफ़ दिखेगा... हाँ... वो उडती चिड़िया भी.. जो बार बार हमारे आस पास अठखेलियाँ  करती   मुझे चिढ़ा रही थी....

1 comment:

  1. Hi Saloni...

    This is something which is the best of all I could receive. I really dont have words, just want to say thanks for giving this day to me.

    Yeh zindagi ek paheli hai, suna tha lekin khudh paheli bann jana yeh duniya ki hakiqat bann gayi hai shayad... kabhi kabhi sochta hoon ki kiso ko sapne dekhne ka haq nahi hai... kyonki sapne hee hai joo dukh de jate hai...

    I had always and will always wish that you grow in life and find yourself, its high time... Please make your identity Dumbo...

    Take care and keep writing... Miss u, regds, Rishi

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