कुछ कुछ पढ़ा मैंने... शिव और शक्ति के विषय में... दोनों के प्रेम,
दोनों की पूर्णता के विषय में....
लेकिन एक विरोधाभास है... एक दर्शन हैं तो एक विधि....
एक दार्शनिक हैं... संवेदनशील हैं तो वहीँ एक विज्ञानं... अस्तित्वगत... विधि...
पुरानो में देवी और शिव के संवादों द्वारों ही उनके आस्तित्व का, जगत के सत्य का और उनकी उत्पत्ति के विषयो का उद्दभव हुआ है...
देवी अपने सारे प्रश्न ऐसे पूछती हैं जो दार्शनिक मालूम होते हैं किन्तु शिव उनके सवालों के जवाब विधि में देते हैं... वो "क्या" पूछती हैं तो उत्तर "कैसे" में पाती हैं...
कहने का अर्थ यह है की देवी पूछती हैं कि " हे प्रभु आपका सत्य क्या है?"
वे ये नही बताते कि वे कौन हैं, अपितु इसके प्रतिउत्तर में शिव एक विधि बताते हैं कि ये सब करो तुम स्वयं ही जान जाओगी...
इसलिए उत्तर परोक्ष है प्रत्यक्ष नही...
शायद यही फर्क है स्त्री और पुरुष में....
स्त्री भावुक है, दर्शन है, अनुभव है....और पुरुष विधि है, अस्तित्वगत है, विज्ञानं है...
फिर भी दोनों एक दुसरे क पूरक हैं...
दोनों में प्रेम हैं...
स्त्री का सबसे बड़ा गुण है समर्पण... जिससे कि उसमे सृजनता का गुण विकसित होता है... इसलिए विधाता ने सिर्फ स्त्री को ही सृजनात्मक बनाया है...
स्त्री प्रारूप है समग्र ग्राहकता का, समर्पण का, प्रेम का...
वह सिर्फ ग्रहण ही नही करती बल्कि सृजन भी करती है और उस सृजन का विस्तार भी करती है...
स्त्री में एक अच्छी शिष्य होने के ये सभी गुण हैं... हालाँकि शिष्य होने के लिए स्त्री होना अनिवार्य नहीं पर हाँ स्त्रैण होना अनिवार्य है... स्त्री और पुरुष में शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक फर्क भी होता है.
शिव और शक्ति का एक रूप अर्धनारेश्वर भी है. देवी शिव कि प्रिय हैं, उनकी अर्धांगिनी हैं...
दोनों के बीच का संवाद प्रेमालाप है. द्वन्द नही है, शंका कि कहीं कोई गुंजाईश नहीं है...
प्रेम में समर्पण है... विसर्जन है... अपने अहम्... अपनी बुद्धि... अपने दर्शन का...
अपने आप को सौंप देना ही प्रेम है...
यही प्रेम एक गुरू और शिष्य के मध्य भी घटना ज़रूरी है.शिक्षा कि गहराई के लिए, ग्रहण करने के लिए गहरे प्रेम का होना अनिवार्य है...
शिष्य मात्र शिष्य न रह कर गुरू का अर्धांग बन जाता है... प्रेम ही शिक्षा का सही अर्थ है...
जिस प्रकार देवी एक अबोध शिष्या कि भाँती अपने गुरू शिव से समस्त सृष्टि के विषय में प्रेम पूर्वक सुनती हैं, ज्ञान ग्रहण करती हैं... वो सिर्फ प्रेम और समर्पण से ही संभव है
जिस प्रकार स्त्री गर्भ ग्रहण करती है, उसका सृजन करती है... एक बालक के रूप में... उस सृजन का विस्तार करती है... स्वयं रूपांतरित हो जाती है उस रचना के लिए... जो बहरी नहीं रह जाता उसका हिस्सा बन जाता है उसका अंश... उसी तरह देवी शिष्य रूप में अपने शिव गुरू से ज्ञान अर्जित करती हैं....
ध्यान देने वाली विशेष बात यह है कि " ग्रहण के लिए गहन समर्पण चाहिए..."


