ख्वाइशो के समंदर से, कोई मोती निकल आया,
कसक दिल में उठी, जब भी तेरा ख्याल आया...
कैसे भूल जाये, वो प्यार जो तुमसे पाया,
आज भी है यकीन, तुने मुझे सिर्फ मुझे ही चाहा...
अनछुए अहसास, जैसे बारिशो की बूँद थी,
ठंढी सर्द हवाएं थी, या मौसम की कोई रीत थी...
तपते रेगिस्तान से, दिल के ज़ख्म उभरे थे,
सुकून देती चांदनी सी, तेरी ही तो प्रीत थी...
न भूले हैं वो कुछ, न भूले हैं हम कुछ,
सदियाँ बीती तो क्या, पहली पहली प्रीत थी...
Wednesday, September 15, 2010
Sunday, September 12, 2010
Intzaar....
रतजगा करती हैं दोनों के इंतजार में पलकें,
न तुम ही आते हो, न नींद ही आती है...
कुछ आहट हुई तो पर्दा हटाया,
चाँद था, पूछ रहा था - तू आज भी जगती है...
सूनी पर आस भरी नज़रें जो उठाई मैंने,
छुप कर बदलियों क पीछे से बोला...
ऐसे मत देख, जाता हूँ,
पर तेरे इंतजार में किसी को तड़पता नहीं देखा मैंने...
बहुत देर हुई, चाँद आया नहीं वापस,
कहाँ गया होगा...
तुम सो चुके हो शायद, अगर जागते हो तो देखो,
तुम्हारी खिड़की के बाहर ही खड़ा होगा....
वो एकमात्र गवाह है मेरे प्यार का, मेरे इंतजार का,
ठिठुरती सर्दियों का, झुलसती गर्मियों का...
रिमझिम बदलियों का और हर मौसम में,
एक सी बरसती मेरी पलकों का...
मौसम सारे एक से बीते विरहा में रीते-रीते,
थक गए हम यूँ सफ़र अब तनहा जीते-जीते...
नींद न आई, चाँद न आया, रात भी अब ढलती है,
आ जाओ बस एक बार, कि सांस अभी चलती है...
न तुम ही आते हो, न नींद ही आती है...
कुछ आहट हुई तो पर्दा हटाया,
चाँद था, पूछ रहा था - तू आज भी जगती है...
सूनी पर आस भरी नज़रें जो उठाई मैंने,
छुप कर बदलियों क पीछे से बोला...
ऐसे मत देख, जाता हूँ,
पर तेरे इंतजार में किसी को तड़पता नहीं देखा मैंने...
बहुत देर हुई, चाँद आया नहीं वापस,
कहाँ गया होगा...
तुम सो चुके हो शायद, अगर जागते हो तो देखो,
तुम्हारी खिड़की के बाहर ही खड़ा होगा....
वो एकमात्र गवाह है मेरे प्यार का, मेरे इंतजार का,
ठिठुरती सर्दियों का, झुलसती गर्मियों का...
रिमझिम बदलियों का और हर मौसम में,
एक सी बरसती मेरी पलकों का...
मौसम सारे एक से बीते विरहा में रीते-रीते,
थक गए हम यूँ सफ़र अब तनहा जीते-जीते...
नींद न आई, चाँद न आया, रात भी अब ढलती है,
आ जाओ बस एक बार, कि सांस अभी चलती है...
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