संस्कृत और हिंदी साहित्य में प्रेमी को भ्रमर की उपमा दी गयी है- जो एक पुष्प पर बैठता है, उसका रस पीता है और फिर दुसरे पर जा बैठता है. वो किसी एक का हो कर नहीं रह सकता.
उर्दू में प्रेमी को परवाना कहा गया है... जो दीपशिखा के आकर्षण में उसी पर जल कर अपने प्राणों की आहुति दे देता है.
भारतीय सभ्यता में "मर्यादा" नारी के लिए इस्तमाल किया गया शब्द है, नारी से अपेक्षित है के एक के अतिरिक्त दुसरे पुरुष का विचार भी अपने मन में न आने दे... याने " पुरुष भ्रमर और नारी परवाना..."
पर प्रेम तो प्रेम है... उसका तो किसी मजहब, उम्र, या परिस्थिति के कोई वास्ता ही नहीं है... सच-झूठ, सही-गलत सब से परे एक अलग ही दुनिया होती है...
सब के लिए प्रेम के मायने भी अलग होते हैं और अहसास भी...
प्रेम में पाना शब्द नहीं है, सिर्फ देना है, सिर्फ खोना है. खोने की एक अनुपम अनुभूति होती है...
राधा और मीरा दोनों ही कृष्ण से प्रेम करती है. राधा उन्हें पाना चाहती है और मीरा... निस्वार्थ प्रेम की प्रतीक है. वो कुछ भी पाना नहीं चाहती, उनका प्रेम चाहत से बहुत ऊपर था, वो सिर्फ कृष्ण को चाहती है... बस... और कुछ नहीं... और कृष्ण में लींन हो जाती है, कृष्ण उन्हें अपने अंदर समाहित कर लेते हैं...
जो प्रेम में पाने की लालसा रखता है, वो उसे पा लेता है, और जो खोने की... उसे अपने आप को भी खोना पड़ता है. उसे अपनी पहचान, अपना अस्तित्व, सब कुछ खोना पड़ता है, वो अपना सर्वस्व खो देता है, फिर भी आन्दित है, प्रसन्न है, संतुष्ट है..
जहाँ प्रेम है, वहां विरह है... दर्द है... विरह शब्दों में नहीं आता, आंसूयों में आता है. विरह मौन है, शांत है, चुप है, कुछ बोलता नहीं, विरह सुनाई भी नहीं देता, बस... अनुभव की अनुभूति है. कुछ खालीपन का अहसास, कुछ छूटने की अनुभूति...
तुम प्रेम को जानो, विरह अपने आप प्रकट होगा, की प्रेम की पहली प्रतीति विरह है... और अंतिम प्रतीति मिलन...
प्रेम को सिर्फ वही पा सकता है, जो मृत्यु के लिए तैयार हो, प्रेम जीवन ही नहीं अपितु मृत्यु भी है. उस शाश्वत प्रेम के अमृत को वही पा सकता है जिसमे जीवन की आहुति देने की शक्ति हो...
Wednesday, August 18, 2010
Tuesday, August 10, 2010
phir miloge kabhi...
ऊँचे ऊँचे पर्वत,चारो और बादल ही बादल... दूर दूर तक कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था... अलावा उन बादलो के... सावन की रिमझिम में तन तो क्या मन भी भीग रहा था.. और ऐसे में तुम्हारा हाथ थामे चलना किसी सपने से कम था क्या ? जानते हो! जब भी किसी हिल स्टेशन पर जाती थी, या फिल्मो में, गानों में ऐसा कुछ देखती थी... तो बस तुम ही नज़र आते थे.
सालो इंतजार किया है मैंने... नहीं नहीं... इंतजार जैसा तो कुछ भी नहीं था मेरे पास, क्योकि मैं जानती भी नहीं थी.. की कभी हम यूं मिल जाएँगे, बस एक उम्मीद सी थी... और क्या... शायद... पता नहीं...
मन बहुत चंचल है, बरबस भटकता ही रहा है, तुम इतने पास थे, तुम्हे महसूस कर पा रही थी, तुम्हे छू पा रही थी फिर भी मन उदास था. जाने क्यों..? एक टीस जो कसक बनी कलेजे को तार तार किये जा रही थी... तुमसे अलग होने का दर्द था शायद...
पल भर को बादल छटा तो सबकुछ नज़र आया... पर्वत भी, पेड़ पौधे भी, झरने भी और चिड़िया भी...
पर फिर से बादल ने सब छुपा लिया. ये लुका छिपी अच्छी लग रही थी, पर दो मिनट के लिए तुम दूर गए और बादलो में दूर दूर तक नज़र नहीं आये...
मन बौराया सा और आँखे बेचैन सी जैसे अपने तपिश से उन बादलो में सुराख़ कर, तुम्हे देखने में कामयाब हो जाएगी... तभी तुम्हारी आवाज़ आई, बेचैन, घबराई सी... उनमे वही दर्द था, मेरे खो जाने की... आवाज़ की दिशा में मैंने कदम बढाया ही था की तुमसे जा टकराई, और तुमने मुझे खुद में समेट लिया... बस यही जन्नत थी... बस सारी सृष्टि रुक जाए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए... तुम्हारे प्यार के अलावा.... बरसो बरस... बस तुम्हे ही चाह है...
कितना वक़्त बीत चुका है, ज़िन्दगी ने कितने उतार चढ़ाव देखे, हर ख़ुशी में तुम्हे याद किया, हर दर्द में तुम्हारा कन्धा तलाशती रही, आँखों में सावन भादों की झड़ी भी इन्ही बादलो की तरह लुका छिपी का खेल खेलती रही...
आज जब तुम फिर से मिले हो तो क्या तुम्हे वो सब समझा पाउंगी... वो प्यार का अनछुआ अहसास, वो टूट कर बिखरने का दर्द, वो तुम्हे खो देने की कसक, सालो की कसमसाती नींद, छोटी बड़ी हर बात जो हमसे जुडी हो...
तुम बहुत आगे निकल आये हो, बहुत प्रक्टिकल हो गए हो, दुनियादारी की समझ भी आ गयी है... वो बचपन, वो अहसास अगर याद भी होगा तो अपनी ज़िन्दगी की उपापोह में वक़्त ही कहाँ इन सब फ़िज़ूल बातो पे ठहरने का... और मैं चाहती भी नहीं की तुम कहीं भी ठहरो...
पर जब तुम मिले... तो मैंने पाया की मैं तो वही ठहरी हूँ ... अभी तक आगे बढ़ भी नहीं पायी हूँ , अभी भी उन्ही पिछली गलियारों में भटक रही हूँ, तुम्हे ढूंढ रही हूँ...
नहीं जानती की उस बुद्धू पागल 'अपने' से दोबारा मिल भी पाउंगी या नहीं, पर अब इंतजार ज़रूर करूंगी.. कभी तो तुम लौट के आओगे, कभी तो ये बादल छटेंगे और फिर सबकुछ साफ़ दिखेगा... हाँ... वो उडती चिड़िया भी.. जो बार बार हमारे आस पास अठखेलियाँ करती मुझे चिढ़ा रही थी....
सालो इंतजार किया है मैंने... नहीं नहीं... इंतजार जैसा तो कुछ भी नहीं था मेरे पास, क्योकि मैं जानती भी नहीं थी.. की कभी हम यूं मिल जाएँगे, बस एक उम्मीद सी थी... और क्या... शायद... पता नहीं...
मन बहुत चंचल है, बरबस भटकता ही रहा है, तुम इतने पास थे, तुम्हे महसूस कर पा रही थी, तुम्हे छू पा रही थी फिर भी मन उदास था. जाने क्यों..? एक टीस जो कसक बनी कलेजे को तार तार किये जा रही थी... तुमसे अलग होने का दर्द था शायद...पल भर को बादल छटा तो सबकुछ नज़र आया... पर्वत भी, पेड़ पौधे भी, झरने भी और चिड़िया भी...
पर फिर से बादल ने सब छुपा लिया. ये लुका छिपी अच्छी लग रही थी, पर दो मिनट के लिए तुम दूर गए और बादलो में दूर दूर तक नज़र नहीं आये...
मन बौराया सा और आँखे बेचैन सी जैसे अपने तपिश से उन बादलो में सुराख़ कर, तुम्हे देखने में कामयाब हो जाएगी... तभी तुम्हारी आवाज़ आई, बेचैन, घबराई सी... उनमे वही दर्द था, मेरे खो जाने की... आवाज़ की दिशा में मैंने कदम बढाया ही था की तुमसे जा टकराई, और तुमने मुझे खुद में समेट लिया... बस यही जन्नत थी... बस सारी सृष्टि रुक जाए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए... तुम्हारे प्यार के अलावा.... बरसो बरस... बस तुम्हे ही चाह है...
कितना वक़्त बीत चुका है, ज़िन्दगी ने कितने उतार चढ़ाव देखे, हर ख़ुशी में तुम्हे याद किया, हर दर्द में तुम्हारा कन्धा तलाशती रही, आँखों में सावन भादों की झड़ी भी इन्ही बादलो की तरह लुका छिपी का खेल खेलती रही...
आज जब तुम फिर से मिले हो तो क्या तुम्हे वो सब समझा पाउंगी... वो प्यार का अनछुआ अहसास, वो टूट कर बिखरने का दर्द, वो तुम्हे खो देने की कसक, सालो की कसमसाती नींद, छोटी बड़ी हर बात जो हमसे जुडी हो...
तुम बहुत आगे निकल आये हो, बहुत प्रक्टिकल हो गए हो, दुनियादारी की समझ भी आ गयी है... वो बचपन, वो अहसास अगर याद भी होगा तो अपनी ज़िन्दगी की उपापोह में वक़्त ही कहाँ इन सब फ़िज़ूल बातो पे ठहरने का... और मैं चाहती भी नहीं की तुम कहीं भी ठहरो...
पर जब तुम मिले... तो मैंने पाया की मैं तो वही ठहरी हूँ ... अभी तक आगे बढ़ भी नहीं पायी हूँ , अभी भी उन्ही पिछली गलियारों में भटक रही हूँ, तुम्हे ढूंढ रही हूँ...
नहीं जानती की उस बुद्धू पागल 'अपने' से दोबारा मिल भी पाउंगी या नहीं, पर अब इंतजार ज़रूर करूंगी.. कभी तो तुम लौट के आओगे, कभी तो ये बादल छटेंगे और फिर सबकुछ साफ़ दिखेगा... हाँ... वो उडती चिड़िया भी.. जो बार बार हमारे आस पास अठखेलियाँ करती मुझे चिढ़ा रही थी....
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